Court's Strictness on UP Police: उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच और कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट से लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट तक कई मामलों में गंभीर सवाल उठे हैं। अदालतों की टिप्पणियों में FIR दर्ज करने, गिरफ्तारी की प्रक्रिया, सबूत सुरक्षित रखने और चार्जशीट तैयार करने जैसे अहम चरणों में कथित खामियां सामने आई हैं। हाल के मामलों को जोड़कर देखें तो तस्वीर सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं दिखती। अलग-अलग मामलों में रिकॉर्ड और पुलिस की कार्रवाई के बीच अंतर, हिरासत की अवधि में विसंगति और जरूरी दस्तावेज या CCTV उपलब्ध न होने जैसे मुद्दे अदालतों के सामने आए हैं। 1. FIR में आरोपी का नाम क्यों नहीं? बुलंदशहर के खुर्जा मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल उठा कि जिस व्यक्ति को शिकायत के मुताबिक मौके पर पकड़े जाने की बात कही गई, उसे FIR में अज्ञात क्यों बताया गया। बाद में जांच में उसका नाम सामने आया और उसे क्लीन चिट भी दी गई। कोर्ट ने FIR, बाइक के नंबर और शिकायत दर्ज होने के समय से जुड़े रिकॉर्ड पर स्पष्टीकरण मांगा। पुलिस के जवाब से असंतुष्ट अदालत ने नया हलफनामा भी मांगा और SHO को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया। मामले में कोर्ट ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए जरूरत पड़ने पर CBI जांच पर विचार की बात कही। 2. गिरफ्तारी और हिरासत के रिकॉर्ड में अंतर इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने कमलेश कुमार से जुड़े मामले में गिरफ्तारी की तारीख और पुलिस की बताई हिरासत अवधि में अंतर का मुद्दा आया। रिकॉर्ड में गिरफ्तारी 19 अगस्त की थी, जबकि पुलिस के अनुसार व्यक्ति 15 अगस्त से ही हिरासत में था। अदालत ने इसे गंभीर प्रक्रिया संबंधी चूक माना और मुआवजे का आदेश दिया। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी मेमो, रिमांड और हिरासत से जुड़े दस्तावेजों की सटीकता बेहद महत्वपूर्ण होती है। 3. कोर्ट के आदेश के बाद रिहाई में देरी सचिन आर्य के मामले में अदालत के रिहाई आदेश के बावजूद लगभग 20 घंटे की देरी का मुद्दा सामने आया। हाई कोर्ट ने गिरफ्तारी और रिहाई से संबंधित कानूनी दिशा-निर्देशों के पालन पर सवाल उठाते हुए अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए। 4. सबूत और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने पर सवाल यासीन मामले में पुलिस की ओर से जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण जमानत की सुनवाई में देरी हुई। वहीं देवरिया के एक मामले में पुलिस स्टेशन का CCTV फुटेज उपलब्ध न होने पर हाई कोर्ट ने सवाल उठाए। जांच में CCTV, कॉल रिकॉर्ड, दस्तावेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कई मामलों में अहम हो सकते हैं। इसलिए इन्हें सुरक्षित रखना और समय पर अदालत के सामने प्रस्तुत करना जांच प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 5. चार्जशीट की गुणवत्ता पर भी निगरानी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में जांच की गुणवत्ता पर सवाल उठने के बाद अलग-अलग मामलों की 10 चार्जशीट मंगाकर उनकी समीक्षा की। इसका उद्देश्य यह देखना था कि अदालत द्वारा पहले दिए गए जांच संबंधी निर्देशों का पालन जमीन पर किस तरह हुआ। NSA मामलों में भी अदालत सख्त राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत हिरासत के मामलों में भी अदालतों ने प्रक्रिया की जांच की है। संभल के मुल्ला अफरोज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को NSA हिरासत रद्द की और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत लगाई। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में यह मामला दर्ज है। इसी तरह आकृति चौधरी के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने NSA हिरासत रद्द करते हुए 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश दिया था। अदालत ने हिरासत के आधार और संबंधित प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। अदालतों के सवालों का बड़ा संदेश इन मामलों में अदालतों की आपत्तियां मुख्य रूप से पुलिस रिकॉर्ड की विश्वसनीयता, गिरफ्तारी की वैधानिक प्रक्रिया, सबूतों के संरक्षण और जांच की निष्पक्षता से जुड़ी हैं। हालांकि, हर मामला अलग है और किसी एक या कुछ मामलों के आधार पर पूरी उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। फिर भी अदालतों की लगातार निगरानी यह साफ करती है कि FIR से लेकर चार्जशीट और हिरासत से लेकर रिहाई तक हर चरण में तय कानूनी प्रक्रिया और रिकॉर्ड की शुद्धता महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सामने आए ये मामले इसी जवाबदेही को रेखांकित करते हैं। ये भी पढ़ें: यमुना अथॉरिटी में फिर आरके सिंह की वापसी, एक साल बढ़ा कार्यकाल, जानिए कौन हैं?